स्टॉक को माल की तरह देखना बंद कीजिए, पैसे की तरह देखिए। शेल्फ़ पर रखा हर डिब्बा वह नोट है जो आपने थोक वाले को दे दिया और अभी तक वापस नहीं आया — मुनाफ़े की तीन परतों की तीसरी परत यही है। इस नज़र से दुकान की तीन पुरानी बीमारियाँ नई दिखने लगती हैं।
बीमारी 1 — जो ख़त्म हो गया
सबसे महँगी बिक्री वह है जो हुई नहीं। ग्राहक ने माँगा, था नहीं, वह लौट गया — और अक्सर सिर्फ़ वही चीज़ नहीं, पूरी टोकरी लेकर लौट गया। ख़त्म हुए माल का पता ग्राहक से चलना दुकान की सबसे आम और सबसे अनदेखी चोट है। इलाज गिनती नहीं, निशान है: हर सामान की एक न्यूनतम मात्रा तय हो, और उससे नीचे आते ही वह सामान "मँगाने वाली सूची" में दिखे।
बीमारी 2 — जो बिकता ही नहीं
मार्च में जोश में मँगाए शोपीस अगस्त में भी वहीं हैं। यह माल नुक़सान जैसा नहीं दिखता — शेल्फ़ भरी दिखती है, दुकान सजी दिखती है। पर वह पाँच महीने से रुका हुआ पैसा है, जिससे इस बीच चार बार चलने वाला माल आ सकता था। धीमा माल पकड़ने का एक ही तरीक़ा है: हर सामान के आगे यह दिखे कि कितना आया, कितना बिका, कितना बचा। "आया 24, बिका 2, बचा 22" — यह लाइन ख़ुद कह देती है कि अगली बार मत मँगाओ।
बीमारी 3 — गिनती का पहाड़
साल में एक बार पूरी दुकान गिनना इसलिए पहाड़ है क्योंकि साल भर कुछ लिखा नहीं गया। जिस दिन बिक्री और खरीद के साथ स्टॉक अपने आप घटता-बढ़ता है, उस दिन गिनती अलग काम रहती ही नहीं — कभी-कभार का मिलान रह जाती है, जैसे गल्ले का शाम का मिलान। बड़ी गिनती की जगह छोटा नियम: खरीद का बिल आते ही चढ़े, बिक्री होते ही घटे। (यह हिसाब की पूरी गाइड का पाँचवाँ खाता है।)
कितना माल रखना सही है?
इसका कोई एक जवाब नहीं, पर एक कसौटी है: जो सामान महीने में जितनी बार बिकता है, उसका उतने हफ़्तों का स्टॉक काफ़ी है। रोज़ बिकने वाली चीज़ का हफ़्ते-दो हफ़्ते का, महीने में दो बार बिकने वाली चीज़ का एक-दो का। इससे ज़्यादा रखा माल बचत नहीं है — वह थोक वाले की तिजोरी में जमा आपका पैसा है, बिना ब्याज के। और यह कसौटी लगाने के लिए भी वही एक चीज़ चाहिए: लिखा हुआ हिसाब कि क्या कितना बिकता है।