"इस महीने कितना कमाया?" — ज़्यादातर दुकानदार इसका जवाब बिक्री से देते हैं: "क़रीब सत्तर हज़ार का माल बेचा।" पर बिक्री कमाई नहीं है। सत्तर हज़ार की बिक्री वाली दुकान घाटे में भी हो सकती है, और तीस हज़ार वाली फ़ायदे में। असली सवाल तीन परतों का है।
परत 1 — बिक्री में से माल की लागत घटाइए
जो सामान 850 में बिका, वह कितने में आया था? मान लीजिए 640 में। तो उस बिक्री की असली कमाई 210 है — इसे मार्जिन कहते हैं। महीने भर की बिक्री में से महीने भर के बिके माल की लागत घटाइए। यह हुआ माल का मुनाफ़ा। इसी परत पर यह भी दिखता है कि कौन सा सामान कमाता है और कौन सा सिर्फ़ बिकता है — 5% मार्जिन वाला सामान शेल्फ़ घेरता है, 40% वाला दुकान चलाता है।
परत 2 — दुकान का खर्च घटाइए
किराया, बिजली, तनख़्वाह, टेम्पो, पैकिंग, फ़ोन — यह सब माल के मुनाफ़े में से जाता है। महीने का 18,000 किराया और 9,000 तनख़्वाह हो, तो 40,000 के माल-मुनाफ़े में से असल में 13,000 बचे। ज़्यादातर दुकानदार यह परत गिनते ही नहीं, क्योंकि खर्च कहीं लिखा नहीं होता। इसीलिए खर्च का खाता मुनाफ़े की गिनती का आधा काम है — वह खाता कैसे रखें, हिसाब की पूरी गाइड में है।
परत 3 — जो बचा, वह भी दो जगह बँटा है
13,000 बचे — पर उसमें से 6,000 उधारी में बाहर पड़ा है और 4,000 का माल शेल्फ़ पर जमा है। हाथ में 3,000 आए। मुनाफ़ा और नक़दी दो अलग चीज़ें हैं: मुनाफ़ा बताता है कि दुकान चल रही है या नहीं, नक़दी बताती है कि घर चलेगा या नहीं। दोनों देखिए, हर महीने।
महीने में एक बार, आधा घंटा
महीने की पहली तारीख़ को पिछले महीने के चार आँकड़े निकालिए: कुल बिक्री, बिके माल की लागत, कुल खर्च, और बाहर पड़ा उधार। इन चार से ऊपर की तीनों परतें निकल आती हैं। बही में यह आधे घंटे का काम है — बशर्ते बिक्री और खर्च साल भर लिखे गए हों (बही बनाम मोबाइल ऐप में इसी जोड़ की बात है)। और यही वह जगह है जहाँ लिखा हुआ हिसाब अंदाज़े से अलग हो जाता है: अंदाज़ा हमेशा मुनाफ़ा बताता है, हिसाब कभी-कभी घाटा भी दिखाता है — और घाटा जितनी जल्दी दिखे, उतना सस्ता पड़ता है।