गल्ला मिलाना यानी दिन के अंत में यह जाँचना कि दराज़ में जितना नक़द है, उतना ही होना भी चाहिए था। जो दुकानदार यह रोज़ नहीं करता, वह महीने में एक बार करता है — और तब कमी मिलने पर कुछ नहीं कर सकता, क्योंकि पता ही नहीं कौन से दिन की है।
पहले यह समझिए कि गल्ला क्यों नहीं मिलता
कमी का मतलब हमेशा चोरी नहीं होता। ज़्यादातर बार वजहें यह होती हैं:
- कोई बिक्री लिखी ही नहीं गई — भीड़ में छूट गई।
- उधार दी गई बिक्री नक़द में गिन ली गई, या उल्टा। (उधार का खाता अलग रखने का तरीक़ा उधार वसूलने के 7 तरीके में।)
- UPI में आया पैसा नक़द में जोड़ लिया गया।
- गल्ले से हुआ छोटा खर्च — चाय, टेम्पो, मज़दूरी — कहीं लिखा नहीं गया।
- रेज़गारी का लेन-देन।
ध्यान दीजिए — पाँच में से चार वजहें न लिखने की हैं। गल्ला मिलाना असल में लिखाई की जाँच है, जिसकी नींव हिसाब की पूरी गाइड में रखी गई है।
दो मिनट का रोज़ का तरीक़ा
- सुबह की शुरुआती नक़दी लिखिए। जो रेज़गारी लेकर दिन शुरू किया, वही आधार है।
- दिन भर तीन चीज़ें अलग रखिए: नक़द बिक्री, UPI बिक्री, उधार बिक्री। तीनों का जोड़ अलग-अलग चाहिए — कुल बिक्री से गल्ला नहीं मिलता।
- गल्ले से गया हर पैसा लिखिए — भले पाँच रुपये की चाय हो।
- बंद करते समय गिनिए और इस जोड़ से मिलाइए: शुरुआती नक़दी + नक़द बिक्री − गल्ले से खर्च।
- फ़र्क़ मिले तो उसी शाम लिखिए — कितने का, किस दिन। अगली सुबह नहीं।
फ़र्क़ बार-बार मिले तो
हफ़्ते में तीन बार गल्ला कम मिल रहा है तो वह रेज़गारी की भूल नहीं है — या बिक्री लिखने का तरीक़ा टूटा है, या गल्ले तक हाथ ज़्यादा लोगों के हैं। दोनों का इलाज एक ही है: बिक्री उसी वक़्त लिखी जाए, और गल्ले से हर निकासी की entry हो। जिस दुकान में यह दो नियम चलते हैं, वहाँ कमी अपने आप बताती है कि वह कहाँ से आई।