उधार देना दुकानदारी का हिस्सा है। दिक़्क़त उधार देने में नहीं, वापस माँगने में है — क्योंकि माँगना पड़ता है मुँह पर, दूसरे ग्राहकों के सामने। इसीलिए ज़्यादातर दुकानदार माँगते ही नहीं, और पुराना उधार धीरे-धीरे डूब जाता है। यह सात तरीक़े उसी अटपटेपन को कम करने के हैं। (उधार का खाता कैसे रखा जाए, वह हिसाब की पूरी गाइड में है।)
- देते समय ही तारीख़ तय कीजिए। "अगले हफ़्ते दे दूँगा" को उसी वक़्त पक्का कीजिए — "ठीक है, अगले शनिवार?" जो बात देते समय तय हो जाती है, माँगते समय अटपटी नहीं लगती।
- लिखकर दिखाइए। बोलकर माँगने और लिखा हुआ दिखाने में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ है। बही या फ़ोन में entry दिखाकर कहा गया "भैया, 1,240 हो गए हैं" बहस की गुंजाइश ही नहीं छोड़ता।
- संदेश से माँगिए, मुँह से नहीं। व्हाट्सएप पर भेजा याद-दिलावा दुकान की भीड़ के सामने कहे गए वाक्य से हज़ार गुना आसान है — देने वाले के लिए भी। रक़म और बिल नंबर साथ हो तो सवाल भी नहीं उठता।
- छोटी किस्तें मान लीजिए। 2,000 का पूरा इंतज़ार करने से 500-500 की चार किस्तें बेहतर हैं। पैसा घूमता रहता है और ग्राहक बना रहता है।
- नए उधार की सीमा बाँधिए। जिस पर पुराना बाक़ी है, उसे नया उधार देने से पहले पुराने का ज़िक्र कीजिए। सीमा तय हो — रक़म की भी, दिनों की भी।
- पुराने उधार की सूची अलग रखिए। महीने में एक बार देखिए कि 30 दिन से पुराना कौन सा है। जो जितना पुराना, उतनी पहले उसकी बारी।
- QR साथ भेजिए। याद-दिलावे के साथ भुगतान का QR हो तो "अगली बार आऊँगा तब दे दूँगा" वाला बहाना ख़त्म — वहीं बैठे-बैठे UPI हो जाता है।
इन सातों में एक बात साझा है: वसूली रक़म की लड़ाई नहीं, याद की लड़ाई है। जिसका हिसाब लिखा और सामने है, उसका पैसा लौटता है। वसूला हुआ पैसा उसी शाम गल्ले के मिलान में भी दिखना चाहिए — तरीक़ा गल्ला रोज़ कैसे मिलाएँ में।
Billing Babu में हर उधार बिल से जुड़ा रहता है, और एक बटन दबाते ही रक़म, बिल नंबर और भुगतान QR के साथ याद-दिलावा ग्राहक के व्हाट्सएप पर चला जाता है — भेजने से पहले पूरा संदेश आप ख़ुद पढ़ लेते हैं।