महीने के आख़िर में हर दुकानदार के पास एक ही सवाल बचता है: "बिक्री तो ठीक थी, फिर पैसा गया कहाँ?" जवाब खोजने की जगह भी सबकी एक ही है — याददाश्त। और याददाश्त उस पैसे के बारे में सबसे कमज़ोर होती है जो बिना बिल के निकला हो। (खर्च का खाता हिसाब की पूरी गाइड के पाँच खातों में से एक है।)
दुकान का खर्च दो तरह का है, और दोनों का इलाज अलग है।
बड़े खर्च — जो दिखते हैं पर गिने नहीं जाते
किराया, बिजली, नौकर की तनख़्वाह। यह हर महीने के पक्के खर्च हैं — इनका मिलना तय है, तारीख़ लगभग तय है, रक़म लगभग तय है। फिर भी ज़्यादातर दुकानों में यह किसी खाते में नहीं चढ़ते, क्योंकि "यह तो पता ही है।" पता होना और गिना होना दो अलग चीज़ें हैं: जब तक यह मुनाफ़े की गिनती में से घटते नहीं, तब तक मुनाफ़ा बढ़ा-चढ़ा दिखता रहता है। महीने के पक्के खर्च एक बार सूची बनाकर लिख लीजिए — यह पाँच मिनट का एक बार का काम है।
छोटे खर्च — जो गल्ले से रिसते हैं
चाय, टेम्पो, पॉलीथीन, मज़दूरी, मंदिर का चढ़ावा, बच्चे की कॉपी — पचास और सौ रुपये की निकासियाँ, दिन में तीन-चार बार, सीधे गल्ले से। एक-एक रक़म इतनी छोटी है कि लिखना बेकार लगता है; महीने भर की मिलाकर अक्सर तीन-चार हज़ार बैठती है। यही वह पैसा है जो "पता नहीं कहाँ गया" बनता है, और यही गल्ला रोज़ कैसे मिलाएँ में गिनाई गई कमी की सबसे आम वजह भी है।
इसका इलाज नियम नहीं, आदत है: गल्ले से जो भी निकले, उसी वक़्त लिखा जाए — रक़म और वजह, बस। पाँच सेकंड की entry है। शाम को गल्ला मिलाते समय यही entries बताती हैं कि कमी कमी है या खर्च है।
महीने के अंत में खर्च को मद से देखिए
सिर्फ़ कुल खर्च जानना काफ़ी नहीं — यह जानना ज़रूरी है कि किस मद में कितना गया। किराया 18,000, तनख़्वाह 9,000, बिजली 2,800, टेम्पो 1,600... जब खर्च मदों में बँटा दिखता है, तब दो चीज़ें अपने आप दिखने लगती हैं: कौन सा खर्च हर महीने चुपचाप बढ़ रहा है, और कौन सा घटाया जा सकता है। बिना मद के "खर्च कम करो" सिर्फ़ इरादा है; मद के साथ वह फ़ैसला बन जाता है।
खर्च घटाने से पहले गिनना क्यों ज़रूरी है
बिना हिसाब के खर्च घटाने की कोशिश हमेशा ग़लत जगह चोट करती है — दिखने वाले खर्च पर (नौकर हटा दो, सस्ता माल लाओ), जबकि रिसाव कहीं और होता है। तीन महीने का लिखा हुआ खर्च सामने हो तो घटाने की जगह ख़ुद दिखती है। इसीलिए खर्च का खाता मुनाफ़े की गिनती का आधा काम है — बाक़ी आधा बिक्री और लागत का है।