पहले साफ़ कह दें: बही कोई पिछड़ा तरीक़ा नहीं है। पीढ़ियों से दुकानें बही पर चली हैं, और जो दुकानदार रोज़ ईमानदारी से बही लिखता है, उसका हिसाब कई ऐप वालों से बेहतर होता है। सवाल बही बनाम ऐप का नहीं — लिखे हुए के इस्तेमाल का है। (क्या-क्या लिखना ज़रूरी है, वह हिसाब की पूरी गाइड में है।)
जहाँ बही जीतती है
- न बिजली चाहिए, न नेटवर्क, न चार्जिंग। बही कभी hang नहीं होती।
- लिखने की आज़ादी पूरी — जैसा मन, वैसा लिखो।
- कोई मासिक ख़र्च नहीं।
जहाँ बही हार जाती है
- जोड़ आप को करना पड़ता है। महीने का कुल जानने के लिए महीने भर के पन्ने जोड़ने पड़ते हैं — इसलिए कोई जोड़ता नहीं।
- ढूँढना पन्ने पलटना है। जून का एक बिल चाहिए तो जून की पूरी बही छाननी पड़ती है।
- कॉपी एक ही है। पानी, आग, या खोई हुई बही — सालों का रिकॉर्ड एक साथ जाता है।
- दुकान से बँधी है। बाहर बैठे यह नहीं देख सकते कि आज दुकान पर क्या हुआ।
ऐप का असली फ़ायदा जोड़ में है
ऐप की ख़ूबी यह नहीं कि वह "डिजिटल" है। ख़ूबी यह है कि लिखते ही जोड़ हो जाता है — दिन का, महीने का, ग्राहक का, सामान का। जो सवाल बही से निकालने में घंटा लगता है ("इस महीने कितना बेचा? बचा कितना?"), ऐप में वह पहले से लिखा मिलता है — मुनाफ़े की गिनती इसी जोड़ पर टिका है। और रिकॉर्ड खाते में रहता है, फ़ोन में नहीं — फ़ोन टूटे तो फ़ोन जाता है, हिसाब नहीं।
डर किस बात का, और किसका जायज़ है
"ऐप में डालेंगे तो सरकार देख लेगी" — यह डर सुनने में जितना आम है, तकनीकी रूप से उतना ही ग़लत। हिसाब का ऐप आपकी निजी बही है; वह किसी सरकारी पोर्टल से जुड़ा नहीं होता। सरकार तक वही जाता है जो आप ख़ुद रिटर्न में भरते हैं — यह बात बही में हिसाब रखने पर भी उतनी ही सच है। जायज़ चिंता एक ही है: ऐप बंद हो जाए तो डेटा का क्या? इसलिए ऐसा ऐप चुनिए जिसमें अपना डेटा निकालने (export) की सुविधा हो।
फ़ैसले का आसान नियम
दिन में दस से कम बिक्री हो और उधार न के बराबर — बही काफ़ी है। उससे ज़्यादा हो, उधार चलता हो, या GST का काम हो — जोड़ का काम इतना बढ़ जाता है कि ऐप अपनी क़ीमत हफ़्ते भर में निकाल लेता है।