दुकानदार की सबसे महँगी मजबूरी यह नहीं कि नौकर रखना पड़ता है — यह है कि नौकर रखकर भी गल्ला छोड़ा नहीं जा सकता। खाना खाने घर जाना हो, बैंक जाना हो, माल लेने मंडी जाना हो — दुकान या बंद कीजिए या भरोसे पर छोड़िए। और भरोसे पर छोड़ी दुकान का हिसाब शाम को याददाश्त से मिलता है।
यहाँ पहली बात साफ़ कर लेना ज़रूरी है: ज़्यादातर नौकर चोर नहीं होते। गल्ला कम मिलने की आम वजहें भूल-चूक हैं — बिक्री लिखना छूट गया, रेज़गारी का लेन-देन, उधार को नक़द गिन लिया। दिक़्क़त यह है कि बिना लिखे हिसाब में भूल और चोरी एक जैसी दिखती हैं, और शक हमेशा आदमी पर जाता है, तरीक़े पर नहीं। इसका नुक़सान दोनों तरफ़ है — अच्छा नौकर शक से टूटता है, और असली रिसाव पकड़ में नहीं आता। (लिखे हुए हिसाब की नींव हिसाब की पूरी गाइड में है।)
इंतज़ाम, जो शक की जगह ले ले
- हर बिक्री उसी वक़्त लिखी जाए — जो भी बेचे। नियम आदमी पर नहीं, बिक्री पर हो: बिना entry के सामान दुकान से नहीं निकलता। जब नियम सब पर बराबर है, तो वह बेइज़्ज़ती नहीं है।
- दाम की पर्ची नौकर के भरोसे न हो। जिस दुकान में दाम याद रखने पड़ते हैं, वहाँ नौकर या ग़लत दाम लगाता है या हर बार पूछता है। दाम लिखे हों — बही में या ऐप में — तो कोई भी बिल बना सकता है, और मोल-भाव की गुंजाइश भी बँध जाती है।
- गल्ले से निकासी की entry नौकर भी करे। टेम्पो वाले को सौ रुपये नौकर ने दिए तो लिखे कौन? वही, उसी वक़्त। निकासी लिखने का हक़ देना भरोसे का सबूत है — और दुकान के खर्च में बताए रिसाव का इलाज भी।
- दिन का मिलान साथ बैठकर कीजिए। शाम का गल्ला-मिलान नौकर के सामने, नौकर के साथ हो। कमी मिले तो पहला सवाल "किसने ली" नहीं — "कौन सी entry छूटी" हो। महीने में एक बार की जगह रोज़ का मिलान इसीलिए ज़रूरी है: फ़र्क़ छोटा और ताज़ा रहता है।
- छुट्टी वाले दिन की रिपोर्ट अपने पास आए। दुकान से दूर होकर भी दिन का हिसाब दिखता रहे, तो दूरी भरोसे की परीक्षा नहीं रह जाती।
इसका असली फल — दुकान से छुट्टी
यह इंतज़ाम चोरी रोकने से ज़्यादा बड़ा काम करता है: यह मालिक को दुकान से आज़ाद करता है। जिस दुकान में बिक्री, दाम और निकासी लिखी जाती है, वहाँ मालिक शादी में जा सकता है, बीमार पड़ सकता है, दूसरी दुकान खोल सकता है। जो दुकान सिर्फ़ मालिक की याददाश्त पर चलती है, वह दुकान नहीं — ड्यूटी है।